ज़िन्दगी की हक़ीक़त वो
कुछ इस तरह बयां करने लगा
कि सुनते तो रोते
न सुनते तो महरूम होते
कश्मकश में डूबा हुआ ये दिल
किसी क़यामत का इंतज़ार करता रहा
कि मौत आती तो फ़ना होते
न आती तो महरूम होते
काश मिला जाता किसी तरह
एक बार फिर वो बिछड़ा बचपन
जहाँ बातों के न मतलब होते
हम भी नादान बच्चे होते
न होते तो महरूम होते
अलफ़ाज़ ढूंढ रहा है 'तनहा'
एक बार फिर ऐसे
कि शायर हम भी कभी अच्छे होते
न होते तो महरूम होते ।
ऋशि 'तनहा'


